

चारों जुग परताप तुम्हारा | है परसिद्ध जगत उजियारा ||

और मनोरथ जो कोई लावै | सोई अमित जीवन फल पावै ||

सब पर राम तपस्वी राजा | तिन के काज सकल तुम साजा ||

संकट तें हनुमान छुड़ावै | मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ||

नासै रोग हरे सब पीरा | जपत निरन्तर हनुमत बीरा ||

भूत पिसाच निकट नहिं आवै | महाबीर जब नाम सुनावै ||


सब सुख लहै तुम्हारी सरना | तुम रक्षक काहू को डर ना ||

राम दुआरे तुम रखवारे | होत न आज्ञा बिनु पैसारे ||

दुर्गम काज जगत के जेते | सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||