
Prabhu Mudrika Meli Mukh Maaheen
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं | जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ||

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं | जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ||

जुग सहस्र जोजन पर भानू | लील्यो ताहि मधुर फल जानू ||

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना | लंकेस्वर भए सब जग जाना ||

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा | राम मिलाय राज पद दीन्हा ||

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा | नारद सारद सहित अहीसा ||

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं | अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ||

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई | तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ||

लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।

भीम रूप धरि असुर सँहारे | रामचन्द्र के काज सँवारे ||

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा | बिकट रूप धरि लंक जरावा ||